रायपुर।
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको……..अदम गोंड़वी की इन पंक्तियों को चरितार्थ करती रायपुर इप्टा इन दिनों अपने रंगकर्म को उन्हीं गलियों में रहने वाले लोगों के बीच ले जा रही है जहां संस्कृति के नाम पर सत्ता और व्यवस्था अवतारवाद का यशोगान करवाती है या अश्लील नाच गाना। भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा), रायपुर, इनके बीच कैसे जनता के सवाल उठाये जायें उसी प्रयास में अपने नाटक कुमारी सावित्री का मंचन करती है । मौका था 3 जनवरी क्रांति ज्योति माता सावित्री बाई फूले के जन्म का मुबारक दिन।गांड़ा महासभा (गांड़ा समुदाय की केंद्रीय संस्था) द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जब रायपुर इप्टा का नाटक कुमारी सावित्री मंचित होता है तो दर्शकों की ताली और वाहवाही बरबस निकलने लगती है। यह ताली और वाहवाही क्षणिक नहीं पूरे मंचन के दौरान सभागार में गूंजते रही। इससे कलाकारों का उत्साह दोगुना हो गया। सारे कलाकार नाटक के उद्देश्य और संवादों को दर्शकों तक पहुंचाने में ख़ुद को झोंक देते हैं ।
नाटक की केंद्रीय पात्र कुमारी मंच पर प्रवेश करते ही अपने संवादों और अभिनय से दर्शकों को अपने से जोड़ लेती है । यह जुड़ाव नाटक के अंत तक बना रहता है । इस जुड़ाव में ढ़ील की कोई गुंजाइश नहीं । कचरा बीनकर ख़ुद का और अपने बच्चों का पेट पालती कुमारी हर दिन भोर से ही अपने काम पर निकल जाती है । भारी बारिश, कड़ाके की सर्दी और भीषण गर्मी भी उसे अपने काम से नहीं रोक पाती है । यह उसकी मजबूती भी है और मजबूरी भी। इसी तरह उसका जीवन आभाव में बीत रहा है । उसे ख़ुद के शोषण का पता ही नहीं है, जैसा कि आमतौर पर होता है । शोषित अपने शोषण को नहीं समझ पाते हालाँकि शोषक इस हेतु लगातार साज़िशरत रहते हैं । लेकिन जैसा कि अवश्यंभावी है कुमारी को ख़ुद पर होने वाला शोषण समझ आ जाता है । एक दिन उसकी मुलाक़ात कुछ महिला साथियों से होती है । जो बाबा सहेब आम्बेड़कर जयंती की रैली में नाचते गाते जा रहीं हैं । कुमारी उस रैली को पार कर घर जाने को होती है । महिलायें रोकती है। थोड़ी बहुत नोकझोंक भी होती है । लेकिन थोड़ी देर बाद उन महिलाओं को एहसास होता है और वह कुमारी को बाबा साहेब आम्बेड़कर के विचारों से परिचित कराती हैं । साथ ही उसे गंदा काम छोड़ने को कहती हैं । कुमारी असमंजस में पड़ जाती है । कचरा बीनना छोड़ने से वो अपना और अपने बच्चों का पेट कैसे पाल सकेगी ? महिलायें कुमारी को यक़ीन दिलाती है कि वो इस मामले में उसकी मदद करेंगी । आश्वस्त हो कुमारी गंदा काम छोड़ देती है और अपने नाम के आगे सावित्री जोड़ कुमारी से कुमारी सावित्री बन जाती है । अब वो और लोगों को फूले-आम्बेड़करी विचारधारा से जोड़ने में लग जाती है । बाबा साहेब की जयंती पर वह बाबा साहेब प्रतिमा के पास जहाँ विशाल संख्या में लोग उपस्थित हैं और जयंती मना रहे हैं, कुमारी बड़े उत्साह से वहाँ पहुंचती है । लेकिन वहाँ कुछ ऐसे लोग भी हैं जो बाबा साहेब आम्बेड़कर के नाम की दुकानदारी चलाते हैं । मंच पर बुर्जुआ राजनैतिक दलों के नेताओं, जिन्होने (बुर्जुआ राजनैतिक दल) बाबा साहेब आम्बेड़कर के जीवित रहते उनका घोर विरोध और अपमान किया था, दलित हितैषी होने का ढ़ोंग कर रहे हैं और बड़ी बड़ी बातें भी। जयंती कार्यक्रम का नेतृत्व करने वाले ज़ोर ज़ोर से उछल उछल के ताली पीट रहे हैं । वहां कुमारी के लिए जगह नहीं । उसका वहाँ अपमान होता है। कुमारी दर्शकों से कहती है – भाषणों में तो बड़ी-बड़ी बातेँ लेकिन असलियत में अपने लोगों को भी पास नहीं बिठा सकते । जय भीम बोलो किधर भी चलो। कुमारी अपने मोहल्ले में बाबा साहेब आम्बेड़कर की जयंती मानती है। लोगों को सम्बोधित करते हुऐ कहती है – बहनों मैं ज़्यादा पढी लिखी नहीं हूँ । मुझे ज़्यादा बोलने नहीं आता है । कुछ लोग बाबा साहेब पर अपना हक़ जमाते हैं । लेकिन मैं कहना चाहती हूँ कि बाबा साहेब किसी एक जाति के नहीं हैं, वो सबके हैं । इस तरह कुमारी बाबा साहेब आम्बेड़कर के विचारों को गली-मोहल्लों तक पहुंचाने में जुट जाती है। एक रात कुमारी के सपने में बाबा साहेब आम्बेड़कर आते हैं । कुमारी बड़े उत्साह से आरती उतारने को होती है। बाबा साहेब आम्बेड़कर कुमारी को रोकते हैं । बाबा साहेब कुमारी से कहते हैं – मैंने बौद्ध धर्म इसलिए ही अपनाया था कि पाखंड से दूर हो सकूं। पाखंड छोड़ो कुमारी। अब कुमारी पाखंड मुक्त है। बाबा साहेब आम्बेड़कर उसके अवचेतन में बस गये हैं। नाटक के अंतिम दृश्य में बाबा सहेब दलितों पर होने वाले अत्यचार से दुःखी हैं । वह दर्शकों से कहते हैं – हमारे दो दुश्मन हैं एक ब्राम्हणवाद और दूसरा पूंजीवाद । लेकिन आज हमारी लड़ाई पूंजीवाद से छूटते जा रही है । नतीजतन जतिवाद और भी ज़्यादा मजबूत होता जा रहा है । पूंजीवाद पे हमले के बिना जति का विनाश नहीं होगा। मेरे प्यारों तुम में बहुत शक्ति है । बस तुम एक हो जाओ । जीत तुम्हारे क़दमों में होगी। संविधान के घोर विरोधी संसद में बैठे हैं। इनसे देश बचाना होगा। उठो संविधान बचाने, उठो देश बचाने।
40 मिनट के नाटक में पूरा सभागार दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था। कुछ दर्शक खड़े खड़े भी नाटक का आनंद ले रहे थे। नाटक के प्रमुख संवादों पर तालियों की गूंज अंत तक बरक़रार थी।
नाटक के केंद्रीय पात्र में नंदा रामटेके ने अपने अभिनय से दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ी । संजय पटेल बाबा साहेब आम्बेड़कर के किरदार में ख़ूब जंच रहे थे। बुलंद आवाज़ के धनी संजय पटेल नें बाबा साहेब आम्बेड़कर के चरित्र को जीवंत बना दिया। नेता की भूमिका में अनुराग सिंह ने जान डाल दिया । अन्य पात्रों में रूपा चौहान, सीमा गजभिये, सविता भालाधरे, आर वी भालाधरे ने अपने अपने पात्रों के साथ बख़ूबी न्याय किया। नाटक में कबीर के दोहे साधो देखो जग बौराना ……. नें चार चाँद लगा दिया।अनिरुद्ध पसरेट के ढ़ोलक की थाप और हर्षवर्धन कौशलेश के हारमोनियम की शानदार जुगलबंदी नें नाटक के गीतों को कर्णप्रिय और अविस्मरणीय बना दिया । रायपुर इप्टा के वरिष्ठ साथी काशी नायक के उच्च स्तरीय लाईट डिज़ाइन नें नाटक को और भी ज़्यादा प्रभावी बना दिया। बैक स्टेज़ में हृचा रथ, विनीता पराते और प्रमिला रात्रे ने अपनी अपनी भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। नाटक का संगीत, लेखन, निर्देशन इप्टा रायपुर के युवा निर्देशक शेखर नाग ने किया है । नाटक की तैयारी में बहुत सारे साथियों का सहयोग प्राप्त हुआ जिनमे प्रमुख हैं – सुमीत चौबे, सुषमा मिश्रा, प्रसून मुखर्जी, हरजीत जुनेजा, पुनीत सोनकर, राजकुमार रामटेके, पीयूष साहू, निलेश गणवीर, मंथन, अनिल थोराट, मुकेश रेड्डी और सुबोध मोरे। इस नाट्य प्रस्तुति में रायपुर और बिलासपुर के संभागायुक्त महादेव कावरे, आईएएस दिलीप वासनीकर, जनसम्पर्क विभाग के अपर संचालक आलोक देव, सामान्य प्रशासन विभाग के अवर सचिव देव लाल भारती, सावित्री बाई फूले एजुकेशन एकेडमी के निदेशिका अंजू मेश्राम, सृष्टि कॉलेज ऑफ नर्सिंग के निदेशक डॉ गोविंद चौहान, गांड़ा महासभा संयोजक डॉ रघुचंद निहाल, अध्यक्ष नारायण बाघ, डमरूधर दीप, बंटी निहाल, वरिष्ठ पत्रकार शेख इस्माइल,जितेंद्र सोनकर, वरिष्ठ चिकित्सक डॉ रमेश सुखदेवे, डॉ स्नेहलता हुमने, वरिष्ठ रंग निर्देशक निसार अली, वरिष्ठ श्रमिक नेता साथी धर्मराज महापात्र, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव पवन सक्सेना, एडवोकेट भंजन जांगड़े सामाजिक कार्यकर्ता सुरेखा जांगड़े, संजीव खुदशाह, जितेंद्र सिंहरौल, अनिल बनज, आशिया , रतन गोंडाने, रेखा गोंडाने, रंजनदेव, अनिल कोरी, शरद ऊके, सुनीला ऊके, दीपक बसोड़, बेनीराम गायकवाड़, भोजराज गौरखेड़े, दीपक बोरकर, जी एस मेश्राम, विजय गजघाटे, गांड़ा समाज की महिलाएँ एवं बच्चे और शहर के गणमान्य नागरिक भारी संख्या में उपस्थित थे । इन सभी साथियों के प्रति इप्टा रायपुर बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता है।

