इजरायली NSA पूर्व अधिकारी का बड़ा दावा: US Iran Ceasefire एक ‘रणनीतिक विफलता’

अमेरिका और ईरान के झंडे के साथ इजरायल के पूर्व एनएसए अधिकारी का प्रतीकात्मक चित्र

अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए युद्धविराम पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। इजरायल के पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) प्रोफेसर चक फ्रीलिच ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी बेबाक राय रखी है। दरअसल, उन्होंने US Iran Ceasefire को एक सैन्य सफलता तो माना है, लेकिन रणनीतिक नजरिए से इसे पूरी तरह विफल करार दिया है। इस चौंकाने वाले बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है।

US Iran Ceasefire: क्यों अधूरे रह गए मुख्य लक्ष्य?

प्रोफेसर फ्रीलिच के अनुसार, युद्ध ने निश्चित रूप से ईरान की सैन्य क्षमता को भारी नुकसान पहुंचाया है। हालांकि, अमेरिका और इजरायल ने संघर्ष की शुरुआत में जो बड़े लक्ष्य तय किए थे, वे बिल्कुल हासिल नहीं हो सके। मुख्य उद्देश्यों में सत्ता परिवर्तन, ईरानी परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना और मिसाइल शक्ति को नष्ट करना शामिल था।

इसके अलावा, क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों को लेकर भी भारी अनिश्चितता बनी हुई है। परिणाम स्वरूप, यह वर्तमान स्थिति ईरान के लिए एक प्रकार की मनोवैज्ञानिक जीत मानी जा रही है, क्योंकि उसने सीधे तौर पर अमेरिका जैसी महाशक्ति का डटकर सामना किया है।

होर्मुज जलडमरूमध्य और जहाजों से टोल की मांग

इस शांति समझौते के बीच एक और बड़ा संकट समुद्री व्यापार को लेकर खड़ा हो गया है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में समुद्री यातायात को अपने नियंत्रण में कर लिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल और वित्तीय संकट गहरा गया है।

वर्तमान में, ईरान विदेशी जहाजों के लिए रास्ता खोलने के बदले उनसे टोल (शुल्क) वसूलने की जिद पर अड़ा हुआ है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानून में इस तरह की जबरन वसूली का कोई ठोस आधार नहीं है। इसके बावजूद, यदि ईरान अपनी यह शर्त मनवाने में सफल रहता है, तो उसे अपनी टूटी हुई अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत को दोबारा खड़ा करने के लिए भारी मात्रा में धन मिल जाएगा।

शांति वार्ता और मध्यस्थों की भूमिका

शांति बहाली के इन प्रयासों में पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। इस अहम मुद्दे पर फ्रीलिच ने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने शांति वार्ता के लिए इजरायल से कोई खास सलाह नहीं ली है।

चूंकि इजरायल के पाकिस्तान के साथ कोई कूटनीतिक संबंध नहीं हैं, इसलिए यह वार्ता उनके लिए ज्यादा प्रासंगिक नहीं है। अंततः, मध्य पूर्व में अभी भी अनिश्चितता के बादल पूरी तरह से छंटे नहीं हैं। ऐसा माना जा रहा है कि बिना किसी ठोस समझौते के ही यह युद्धविराम अनौपचारिक रूप से अगले कुछ सप्ताह तक चलता रहेगा।