JSW Ispat Protected Forest Kanker:कांकेर/रायपुर। छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के उत्तर बस्तर कांकेर (Kanker) जिले से एक बड़े प्रशासनिक और रणनीतिक फैसले की खबर सामने आई है। राज्य के वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने दुर्गुकोन्दल तहसील के राउरवाही गांव की 1.400 हेक्टेयर सरकारी जमीन को ‘संरक्षित वन’ (Protected Forest) घोषित कर दिया है। नवा रायपुर अटल नगर से जारी इस अधिसूचना के बाद इलाके में राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। प्रशासनिक कागजों में इसे वन संरक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बताया जा रहा है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे सीधे तौर पर निजी कंपनी जेएसडब्ल्यू इस्पात स्पेशल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड (JSW ISPAT special projects ltd) को फायदा पहुंचाने वाला कदम माना जा रहा है।
JSW इस्पात के लिए कैसे आसान होगा रास्ता?
सूत्रों के मुताबिक, JSW इस्पात कंपनी ने इस क्षेत्र में अपनी खदान तक पहुंच मार्ग के चौड़ीकरण और भूमिगत बिजली लाइन बिछाने का प्रस्ताव सरकार को दिया था। इसी प्रस्ताव के बाद पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया ने रफ्तार पकड़ी:
- ‘घास’ मद से वन विभाग को ट्रांसफर: अधिसूचना जारी होने से पहले राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन “घास” (चरागाह/सार्वजनिक उपयोग) मद के रूप में दर्ज थी। प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए पहले इसका लैंड यूज बदला गया और फिर जमीन का नियंत्रण राजस्व विभाग से वन विभाग को सौंप दिया गया।
- मिलेगी आसान मंजूरी: जानकारों का मानना है कि जमीन के वन विभाग के नियंत्रण में आने के बाद भविष्य में लीज, डायवर्शन और परियोजना के उपयोग की प्रक्रिया कंपनी के लिए अपेक्षाकृत सरल हो जाएगी। इसे JSW इस्पात के लिए एक “ग्रीन कॉरिडोर” तैयार करने के रूप में देखा जा रहा है।
ग्राम सभा की अनदेखी? ग्रामीणों में भारी आक्रोश
राउरवाही गांव में इस सरकारी फैसले को लेकर भारी नाराजगी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि:
- घास मद की जमीन सार्वजनिक होती है, जिसका उपयोग गांव के एक हजार से अधिक लोग अपने मवेशियों और अन्य जरूरतों के लिए करते थे।
- ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि बिना ग्रामसभा (Gram Sabha) की सहमति लिए, सिर्फ एक निजी कंपनी के फायदे के लिए रातों-रात इस जमीन की कानूनी स्थिति बदल दी गई।
- गांव वालों का कहना है कि भविष्य में इस जमीन पर स्कूल, आंगनबाड़ी या अन्य जरूरी सार्वजनिक सुविधाएं विकसित की जा सकती थीं, जो अब संभव नहीं होगा।
सरकार ने अपने पास सुरक्षित रखे अधिकार
इस आदेश में एक अहम क्लॉज भी जोड़ा गया है, जिसमें राज्य सरकार ने भविष्य में इन अधिकारों में संशोधन या रूपांतरण का अधिकार अपने पास सुरक्षित रखा है। माइनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में होने वाले स्थानीय विरोध से निपटने के लिए अक्सर सरकारें ऐसा कदम उठाती हैं। हालांकि, सरकार इस पूरी प्रक्रिया को सिर्फ एक प्रशासनिक कदम बता रही है, लेकिन सार्वजनिक उपयोग की जमीन को इतनी तेजी से संरक्षित वन घोषित करने पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मामला ‘ग्राम अधिकार बनाम औद्योगिक हित’ का एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।
