Rambhadracharya vs Charandas Mahant: महंत के ‘लाठी’ वाले बयान पर रामभद्राचार्य का पलटवार, बोले- “राम नाम का अर्थ नहीं जानते, इन्हें राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए”

Rambhadracharya vs Charandas Mahant

Rambhadracharya vs Charandas Mahant:रायपुर/कोरबा। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों नेताओं के बयानों को लेकर जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत के हालिया ‘लाठी’ वाले बयान पर अब जगद्गुरु रामभद्राचार्य (Jagadguru Rambhadracharya) ने कड़ा रुख अपनाते हुए तीखा पलटवार किया है। रामभद्राचार्य ने महंत को राजनीति से संन्यास लेने की सलाह देते हुए उनके ज्ञान पर भी सवाल उठाए हैं।

क्या है पूरा मामला?

नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने हाल ही में एक जनसभा के दौरान अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कुछ विवादित शब्दों का प्रयोग किया था, जिसे लेकर भाजपा ने इसे हिंसा भड़काने वाला बयान करार दिया था। महंत के इस बयान के बाद सियासत गरमा गई और अब इस पर आध्यात्मिक और धार्मिक जगत से भी तीखी प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं।

रामभद्राचार्य ने क्या कहा?

जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने महंत के बयान की कड़ी आलोचना करते हुए कहा:

  • ज्ञान पर सवाल: उन्होंने कहा कि चरणदास महंत को ‘राम’ नाम का अर्थ तक पता नहीं है। राम का अर्थ है- ‘रमयति इति रामः’ (जो सबको आनंदित करे)। जो दूसरों को कष्ट देने या हिंसा की बात करे, वह राम के नाम को चरितार्थ नहीं करता।
  • संन्यास की सलाह: रामभद्राचार्य ने तल्ख लहजे में कहा कि ऐसे लोगों को राजनीति से तुरंत संन्यास ले लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा होना बहुत जरूरी है, लेकिन महंत ने अपनी गरिमा खो दी है।

छत्तीसगढ़ की सियासत में उबाल

रामभद्राचार्य के इस बयान के बाद छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सरगर्मियां और तेज हो गई हैं।

  • भाजपा का रुख: भाजपा नेताओं ने रामभद्राचार्य के समर्थन में बयान देते हुए कहा कि कांग्रेस अब हताशा में आकर इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रही है।
  • कांग्रेस का बचाव: दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी के नेताओं का कहना है कि महंत के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। यह मात्र एक राजनीतिक जुमले के रूप में कहा गया था, न कि किसी हिंसा के लिए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह बयानबाजी और अधिक तीव्र हो सकती है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में नेता एक-दूसरे पर निशाना साधने के लिए अब धार्मिक और भाषाई मर्यादाओं का भी सहारा लेने से नहीं चूक रहे हैं।