रायपुर. छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार और सरकारी कर्मचारियों के बीच लंबे समय से चल रहा महंगाई भत्ते (डीए) और बकाया एरियर का विवाद अब एक नया और गंभीर मोड़ ले चुका है। महीनों तक चले पत्राचार, धरना-प्रदर्शन और लगातार आंदोलनों के बाद, यह मामला अब सीधे बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। इस कदम से राज्य सरकार और प्रशासन की मुश्किलें स्पष्ट रूप से बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं।
फेडरेशन ने खटखटाया न्यायालय का दरवाजा
छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन ने राज्य के लगभग पांच लाख कर्मचारियों और पेंशनरों के वित्तीय हितों की रक्षा के लिए हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की है। इस कानूनी कदम के जरिए न्यायालय से सीधे हस्तक्षेप की मांग की गई है। फेडरेशन का स्पष्ट कहना है कि राज्य सरकार को लंबित एरियर और केंद्र के समान देय तिथि से महंगाई भत्ते के पूर्ण भुगतान का कानूनी निर्देश दिया जाए। कर्मचारियों का यह भी आरोप है कि सरकार ने हाल के दिनों में डीए में आंशिक बढ़ोतरी की घोषणा तो की है, लेकिन पुरानी देय तिथियों से बकाया करोड़ों रुपये की एरियर राशि का भुगतान अब तक लटका हुआ है।
एरियर भुगतान और जीपीएफ समायोजन की मुख्य मांग
कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि केंद्र सरकार जब-जब अपने कर्मचारियों का महंगाई भत्ता बढ़ाती है, ठीक उसी देय तिथि से राज्य के कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए। वर्तमान में, राज्य सरकार की देरी के कारण कर्मचारियों का दावा है कि उनके एरियर की एक बहुत बड़ी राशि रुकी हुई है। फेडरेशन ने अपनी याचिका में अदालत से यह भी गुहार लगाई है कि यदि सरकार एकमुश्त नकद भुगतान में असमर्थ है, तो कम से कम इस बकाया एरियर की राशि को कर्मचारियों के सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ) खातों में तत्काल प्रभाव से समायोजित किया जाए।
आगामी सुनवाई पर टिकी प्रदेश की निगाहें
हाल ही में राज्य सरकार द्वारा महंगाई भत्ते में कुछ प्रतिशत की वृद्धि किए जाने के बावजूद कर्मचारियों के बीच गहरा असंतोष बरकरार है, क्योंकि विवाद का मुख्य बिंदु लंबित एरियर ही है। अब हाल ही में दायर की गई इस याचिका पर हाई कोर्ट में जल्द ही सुनवाई होने की संभावना है। प्रदेश के सभी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि न्यायालय इस गंभीर आर्थिक मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है। न्यायालय का यह फैसला न केवल राज्य के वित्तीय बजट पर असर डालेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि कर्मचारियों का यह लंबा संघर्ष किस दिशा में जाएगा।
