छत्तीसगढ़ विधानसभा में पहली बार पहुंचे 120 सरेंडर नक्सली, सदन की कार्यवाही देखकर बने लोकतंत्र के साक्षी

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रायपुर. छत्तीसगढ़ की राजनीति और राज्य के सुरक्षा परिदृश्य के लिए गुरुवार का दिन बेहद ऐतिहासिक रहा, जब मुख्यधारा में लौट चुके 120 आत्मसमर्पित नक्सली पहली बार विधानसभा की कार्यवाही देखने पहुंचे। माओवादी विचारधारा और हिंसा का रास्ता छोड़ चुके इन पूर्व नक्सलियों ने लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में बैठकर सदन की पूरी प्रक्रिया को बेहद करीब से देखा और उसके साक्षी बने। इस समूह में कई बड़े और इनामी माओवादी कमांडर भी शामिल थे, जिनमें एक करोड़ का इनामी रूपेश और झीरम घाटी हमले का प्रमुख मास्टरमाइंड माना जाने वाला 25 लाख का इनामी चैतू भी मौजूद था। चैतू ने महज़ तीन महीने पहले ही जगदलपुर पुलिस के सामने अपना आत्मसमर्पण किया था।

सुरक्षा एजेंसियों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इन पूर्व नक्सलियों का राज्य की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था से सीधे तौर पर जुड़ना, सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति की एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक सफलता है। यह कदम स्पष्ट रूप से यह संदेश देता है कि जो लोग बंदूक छोड़कर शांति और मुख्यधारा का रास्ता चुनते हैं, उनके लिए लोकतंत्र में सम्मान और भागीदारी के पूरे अवसर मौजूद हैं।

  • गुरुवार रात इन सभी 120 आत्मसमर्पित नक्सलियों को राज्य के उप मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा ने अपने आधिकारिक निवास पर विशेष रात्रिभोज (डिनर) के लिए आमंत्रित किया था।
  • गृह मंत्री के निवास पर इन सभी का स्वागत बेहद भव्य तरीके से किया गया, जिसके लिए बाकायदा रेड कार्पेट बिछाया गया और फूलों से उनका अभिनंदन किया गया।
  • सरेंडर कर चुके कैडरों में एक करोड़ का इनामी रूपेश और 25 लाख का इनामी चैतू जैसे खूंखार माने जाने वाले पूर्व नक्सली कमांडर प्रमुख रूप से शामिल रहे।
  • सदन की कार्यवाही के दौरान विधायक पुन्नूलाल मोहले ने किसानों से जुड़े अहम मुद्दे उठाए, वहीं आश्रम-छात्रावासों की स्थिति और अवैध कॉलोनियों के मुद्दे भी गूंजे।
  • सरकार इस पूरी कवायद के ज़रिए बस्तर और अन्य नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में यह कड़ा संदेश देना चाहती है कि हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों को पूरी सुरक्षा और सम्मान दिया जाएगा।

विधानसभा के भीतर जहां एक ओर जनहित के अहम मुद्दों और बजट पर तीखी राजनीतिक बहस चल रही थी, वहीं दर्शक दीर्घा में बैठे इन पूर्व नक्सलियों की मौजूदगी राज्य के बदलते हालात का एक मजबूत प्रतीक बन गई। राज्य सरकार लगातार इस बात पर ज़ोर दे रही है कि भटके हुए युवाओं को मुख्यधारा से जोड़कर उनका बेहतर पुनर्वास किया जाए। विधानसभा में उनकी यह ऐतिहासिक उपस्थिति केवल एक दौरा नहीं है, बल्कि यह एक मनोवैज्ञानिक जीत है, जो यह प्रमाणित करती है कि माओवादी विचारधारा की तुलना में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वीकार्यता कहीं अधिक व्यापक और असरदार है। यह पहल उन नक्सलियों के लिए भी एक सीधा आमंत्रण है जो अब भी जंगलों में भटक रहे हैं, कि वे हिंसा का रास्ता छोड़कर राज्य के विकास और शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनें।