छत्तीसगढ़ विधानसभा: कस्टोडियल डेथ पर गरमाया सदन, भूपेश बघेल और विजय शर्मा के बीच तीखी बहस

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रायपुर. छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र का चौथा दिन प्रदेश की जेलों में हुई कस्टोडियल डेथ (हिरासत में मौत) के मुद्दे पर भारी हंगामे का गवाह बना। प्रश्नकाल के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य की जेलों में हो रही अस्वाभाविक मौतों का मुद्दा उठाया और उप मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा से तीखे सवाल किए। विपक्ष के कड़े तेवर और सरकार के जवाबों से असंतुष्ट होने के कारण अंततः कांग्रेस सदस्यों ने सदन से वॉकआउट कर दिया।

सदन की कार्यवाही शुरू होते ही भूपेश बघेल ने सरकार से जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 तक राज्य की जेलों में हुई मौतों का विस्तृत ब्यौरा मांगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जानना चाहा कि क्या इन सभी मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के दिशा-निर्देशों के तहत न्यायिक जांच पूरी कर ली गई है या नहीं। इस चर्चा के दौरान कवर्धा जेल में बंद रहे पंकज साहू और कांकेर जेल के कैदी जीवन ठाकुर की मौत का मामला विशेष रूप से केंद्र में रहा। बघेल ने जीवन ठाकुर की मौत को सीधे तौर पर हत्या करार देते हुए इस पूरे प्रकरण की जांच विधानसभा की एक विशेष समिति से कराने की मांग की।

इस संवेदनशील मुद्दे पर सदन में जो अहम तथ्य और सरकारी आंकड़े सामने रखे गए, वे इस प्रकार हैं:

  • उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने सदन को बताया कि जनवरी 2025 से 31 जनवरी 2026 के बीच प्रदेश की केंद्रीय और जिला जेलों में कुल 66 बंदियों की कस्टोडियल डेथ हुई है।
  • इन 66 मामलों में से 18 प्रकरणों में मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच पूरी की जा चुकी है।
  • शेष 48 प्रकरणों में मौत के कारणों और परिस्थितियों की न्यायिक जांच की प्रक्रिया वर्तमान में जारी है।
  • गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि कवर्धा जेल के पंकज साहू की मृत्यु मांगी गई समयावधि से पूर्व हुई थी, इसलिए वह 66 मौतों के इस आधिकारिक आंकड़े में शामिल नहीं है।
  • जीवन ठाकुर के मामले में सरकार ने बताया कि उन्हें फर्जी प्रमाण पत्र के मामले में 12 अक्टूबर 2025 को जेल भेजा गया था और जेल अधीक्षक के अनुसार वे इलाज में सहयोग नहीं कर रहे थे।

भूपेश बघेल ने सरकार के इन जवाबों पर कड़ी असहमति जताते हुए आरोप लगाया कि आदिवासी समाज के प्रमुख नेता जीवन ठाकुर को एक फर्जी केस में फंसाया गया था। बघेल के मुताबिक, ठाकुर मधुमेह जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थे, लेकिन उन्हें जेल में समुचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। उन्होंने तर्क दिया कि कोई भी मरीज जानबूझकर अपना इलाज क्यों बिगाड़ेगा। बघेल ने सदन को यह भी बताया कि ठाकुर का बेटा भी उसी जेल में बंद था, लेकिन उसे पिता की देखभाल के लिए उनके साथ नहीं रखा गया और यहां तक कि कांग्रेस विधायकों को भी जेल में उनसे मिलने से रोक दिया गया था।

इन गंभीर आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए गृह मंत्री विजय शर्मा ने बचाव में कहा कि जीवन ठाकुर को न्यायालय की विधिवत अनुमति प्राप्त करने के बाद ही कांकेर से रायपुर लाया गया था। शर्मा ने सदन को जानकारी दी कि जब ठाकुर की तबीयत बिगड़ी तो उन्हें तुरंत अस्पताल भेजा गया था, जहां उनके परिजन लगातार उनसे मिलते रहे। सरकार के इस जवाब को अपर्याप्त और भ्रामक बताते हुए तथा विधानसभा समिति से जांच की मांग खारिज होने पर विपक्षी सदस्यों ने सदन में जमकर नारेबाजी की और अंततः कार्यवाही का बहिष्कार करते हुए बाहर चले गए। यह राजनीतिक गतिरोध स्पष्ट करता है कि राज्य में कानून-व्यवस्था और कैदियों के मानवाधिकार का मुद्दा आने वाले समय में और अधिक तूल पकड़ने वाला है।