बिलासपुर. छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 1 बड़ा फैसला सुनाते हुए रायपुर के नारी निकेतन में रह रही 1 बांग्लादेशी महिला और उसके नाबालिग बच्चे को मुक्त करने से साफ इनकार कर दिया है। अदालत ने महिला की रिहाई की मांग करने वाली 1 बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि चूँकि महिला 1 विदेशी नागरिक है और बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में अवैध रूप से रह रही है, इसलिए उसे सुरक्षा और देखभाल के दृष्टिकोण से नारी निकेतन में रखना पूरी तरह से उचित है। इस मामले की शुरुआत तब हुई जब बिलासपुर के रहने वाले 1 व्यक्ति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर खुद को उस महिला का पति बताया। उसने अदालत से गुहार लगाई थी कि उसकी पत्नी और बच्चे को नारी निकेतन में जबरन बंधक बनाकर रखा गया है, जिन्हें तत्काल उसके सुपुर्द किया जाए। हालांकि, सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने जो तथ्य पेश किए, उन्होंने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी। सरकार ने स्पष्ट किया कि न केवल महिला, बल्कि उसे अपनी पत्नी बताने वाला याचिकाकर्ता भी बांग्लादेशी नागरिक है और ये अवैध रूप से देश की सीमा में दाखिल हुए थे।
- बिलासपुर के देवरीखुर्द निवासी होने का दावा करने वाले याचिकाकर्ता ने कहा था कि उनके धर्म अलग-अलग थे, जिसके कारण उन्होंने भागकर शादी रचाई थी।
- शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि महिला और याचिकाकर्ता बिना पासपोर्ट या वीजा के भारत आए थे और याचिकाकर्ता के खिलाफ बांग्लादेश में अपहरण का 1 मामला भी दर्ज है।
- पुलिस जांच के दौरान इन्हें हिरासत में लिया गया था, जिसके बाद गर्भवती होने के कारण महिला को बाल कल्याण समिति और फिर नारी निकेतन भेजा गया, जहां उसने 1 बच्चे को जन्म दिया।
- चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली खंडपीठ ने टिप्पणी की कि महिला और उसके बच्चे को नारी निकेतन में किसी सजा के तौर पर नहीं, बल्कि उनकी भलाई, देखभाल और सुरक्षा के लिए रखा गया है।
- अदालत ने यह भी बताया कि महिला और उसके बच्चे के निर्वासन (डिपोर्टेशन) की कानूनी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिसके पूरा होने तक उनका वहां रहना 1 अस्थायी और वैध व्यवस्था है।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपने विस्तृत फैसले में यह भी साफ कर दिया कि कानून के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका केवल उसी स्थिति में विचारणीय होती है जब किसी व्यक्ति को पुलिस या प्रशासन द्वारा गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया हो। इस विशिष्ट मामले में, चूँकि संबंधित नागरिक 1 अन्य देश से अवैध रूप से भारत में आए हैं और उनके पास यहां रहने का कोई भी कानूनी अधिकार या वैध दस्तावेज नहीं है, इसलिए प्रशासन की कार्रवाई को अवैध नहीं ठहराया जा सकता है। अदालत ने पाया कि भारत में इस महिला का कोई भी कानूनी अभिभावक या वैध रिश्तेदार मौजूद नहीं है, जिसके कारण उसे खुला नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसे में प्रशासन द्वारा उसे नारी निकेतन जैसी सुरक्षित जगह पर रखना 1 मानवीय और कानूनी आवश्यकता है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि और उस पर दर्ज आपराधिक मामले को देखते हुए भी महिला और नवजात शिशु की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। अब जब तक कूटनीतिक और कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से डिपोर्टेशन का काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक प्रशासन उन्हें सुरक्षित रूप से अपनी निगरानी में रखेगा। इस फैसले ने अवैध घुसपैठ और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों को लेकर 1 सख्त संदेश दिया है।
