छत्तीसगढ़ में राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी तेज, स्थानीय नेताओं को भेजने का भाजपा-कांग्रेस पर भारी दबाव

रायपुर। छत्तीसगढ़ में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचलें तेज हो गई हैं। राज्य से राज्यसभा की दो सीटें आगामी 9 अप्रैल को खाली होने जा रही हैं, जिन पर निर्वाचन के लिए निर्वाचन आयोग ने प्रक्रिया की घोषणा कर दी है। राज्यसभा सदस्य कवि तेजपाल सिंह तुलसी और फूलो देवी नेताम का कार्यकाल पूरा होने के कारण इन दोनों सीटों पर चुनाव कराए जाएंगे। इस बार के चुनाव में सबसे बड़ी चर्चा स्थानीय बनाम बाहरी उम्मीदवार की है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस, दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों पर अपनी-अपनी पार्टी से किसी स्थानीय नेता को राज्यसभा भेजने का जबरदस्त दबाव है।

​छत्तीसगढ़ में कुल 5 राज्यसभा सीटें हैं। कांग्रेस ने अपने शासनकाल में केटीएस तुलसी, राजीव शुक्ला, रंजीत रंजन, देवेंद्र प्रताप सिंह और फूलो देवी नेताम को राज्यसभा भेजा था, लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकायत रही है कि इनमें से अधिकांश नेता बाहरी थे। ऐसे में इस बार दोनों दलों के भीतर स्थानीय चेहरों को प्राथमिकता देने की मांग जोर पकड़ रही है। कांग्रेस की ओर से संभावित उम्मीदवारों में दीपक बैज, टीएस सिंह देव और नेता प्रतिपक्ष चरण दास महंत का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। वहीं, भाजपा की ओर से सरोज पांडे को प्रबल दावेदार माना जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने खुद को इस दौड़ से अलग कर लिया है, जिससे नए और स्थानीय चेहरों के लिए संभावनाएं बढ़ गई हैं।

​राज्यसभा चुनाव से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं:

  • ​छत्तीसगढ़ की 2 राज्यसभा सीटें 9 अप्रैल को खाली हो रही हैं, जिनके लिए 16 मार्च को मतदान और उसी दिन मतगणना होगी।
  • ​चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया 26 फरवरी से शुरू होकर 5 मार्च तक चलेगी, जबकि 9 मार्च तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे।
  • ​कांग्रेस की तरफ से दीपक बैज, टीएस सिंह देव और चरण दास महंत को राज्यसभा भेजने पर विचार किया जा रहा है।
  • ​भाजपा की ओर से सरोज पांडे का नाम राज्यसभा के संभावित दावेदारों में सबसे आगे चल रहा है।
  • ​वर्तमान विधानसभा में भाजपा के पास 54, कांग्रेस के पास 35 और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के पास 1 विधायक है, जो राज्यसभा चुनाव में मतदान करेंगे।

​विधायकों के संख्या बल को देखते हुए इस चुनाव में भाजपा का पलड़ा भारी नजर आ रहा है, लेकिन स्थानीय उम्मीदवार को लेकर पार्टी के भीतर चल रही लॉबिंग भी काफी दिलचस्प है। यह देखना अहम होगा कि दोनों पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं की मांगों को कैसे संतुलित करती हैं और अंततः किन स्थानीय नेताओं पर दांव लगाती हैं। यह चुनाव न केवल राज्यसभा में प्रतिनिधित्व के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि राज्य की भविष्य की राजनीति और स्थानीय नेताओं के मनोबल को दिशा देने में भी अहम भूमिका निभाएगा।