मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ते तनाव ने केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को ही नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी गहरे संकट में डाल दिया है। ईरान और इजरायल के बीच चल रहे इस भीषण युद्ध के कारण दुनिया भर में आर्थिक सुस्ती की आशंकाएं तेज हो गई हैं। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विशेषज्ञों की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, ‘Iran Israel war recession’ का यह गंभीर खतरा भारत, चीन और दक्षिण कोरिया जैसी बड़ी और तेजी से बढ़ती एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
Iran Israel war recession: भारत और एशिया पर प्रभाव
एशिया की तीन प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं, भारत, चीन और दक्षिण कोरिया अपनी ऊर्जा और कच्चे तेल की जरूरतों के लिए काफी हद तक मध्य पूर्व के देशों पर निर्भर हैं। ‘Iran Israel war recession’ का सीधा असर इन देशों के आयात बिल (Import Bill) पर पड़ना शुरू हो गया है। युद्ध के लम्बा खिंचने से वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) चरमरा रही है, जिसका नकारात्मक प्रभाव इन देशों की जीडीपी (GDP) विकास दर पर पड़ना तय माना जा रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल
इस आर्थिक संकट या मंदी (Recession) के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि है।
यदि इस युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे प्रमुख तेल व्यापारिक मार्ग बाधित होते हैं, तो कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। भारत और चीन जैसे देश अपनी कुल तेल खपत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं। तेल महंगा होने से घरेलू महंगाई बेकाबू हो जाएगी, जिससे केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरें (Interest Rates) ऊंची रखनी पड़ेंगी, जो मंदी का सीधा कारण बनता है।
व्यापारिक बाधाएं और निर्यात में गिरावट
महंगे तेल आयात के साथ-साथ, इस युद्ध के कारण माल ढुलाई (Freight Costs) का खर्च भी काफी बढ़ गया है। लाल सागर में मंडराते खतरे के कारण भारतीय और चीनी निर्यातकों को यूरोप तथा पश्चिमी बाजारों तक माल पहुंचाने में भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। यदि भू-राजनीतिक हालात जल्द सामान्य नहीं हुए, तो यह स्थिति एशिया को एक गहरी आर्थिक मंदी की ओर धकेल सकती है।
