बिना नक्सलियों की इजाजत नहीं होती थी शादियां, 2005 के बाद पहली बार गांव में आई बारात

बस्तर के कामाराम गांव में सालों बाद आई बारात और जश्न मनाते गांव वाले

बिना नक्सलियों की इजाजत नहीं होती थी शादियां, 2005 के बाद पहली बार गांव में आई बारात

देश में जब लाल आतंक अपने चरम पर था, तब कई गांव ऐसे थे जहां खुशियां मनाना या विवाह करना किसी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन अब जब देश नक्सलमुक्त होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, तो पुराने टूटे रिश्ते और नए रिश्तों में फिर से बहार लौट आई है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले का एक ऐसा ही गांव है कामाराम (Bastar Kamaram Village), जहां सालों बाद शादी की शहनाइयां गूंजी हैं और पूरा गांव एक साथ इकट्ठा होकर खुशियां मना रहा है।

कभी नक्सलियों से लेनी पड़ती थी इजाजत

एक ऐसा दौर था जब इस गांव में सालों तक संगीत नहीं सुनाई देता था। किसी भी लड़के-लड़की को हल्दी नहीं चढ़ती थी। इस गांव में कोई भी अपनी लड़की का विवाह करने को तैयार नहीं होता था।

अगर किसी को शादी करनी होती थी, तो उन्हें पहले नक्सलियों से इसके लिए मंजूरी लेनी होती थी:

  • गांव के लोगों को नक्सलियों को बताना पड़ता था कि वे किस इलाके में रिश्ता जोड़ रहे हैं।
  • अगर नक्सली रिश्ता जोड़ने की बात मान गए, तो यह भी बताना होता था कि बारात में कितने लोग आएंगे।
  • कार्यक्रम कितने बजे तक चलेगा और बाराती गांव से कब तक लौट जाएंगे, यह पूरा ब्योरा देना पड़ता था।
  • ऐसी शादियों में किसी सरकारी कर्मचारी या दूर के रिश्तेदारों को बुलाने का सवाल ही नहीं बनता था।

2005 के बाद पहली बार आई धूमधाम से बारात

बस्तर जिले के जगरगुंडा से करीब 10 किलोमीटर दूर स्थित कामाराम गांव में हाल ही में दंतेवाड़ा के गोंगपाल गांव से बारात पहुंची है। 2005 के बाद इस इलाके में यह पहला मौका था जब किसी की बारात गाड़ियों के साथ धूमधाम से पहुंची।

इस बारात को देखने के लिए पूरे गांव में भीड़ उमड़ पड़ी। लोगों के चेहरे पर एक अलग ही मुस्कान और खुशी थी, मानो उन्हें कोई बड़ी आजादी मिल गई हो।

नक्सलमुक्त होते बस्तर में लौट रहे लोग

नक्सलियों की दहशत का प्रभाव केवल शादी-ब्याह तक ही सीमित नहीं था। लोग किसी के बीमार पड़ने या मौत होने पर भी आसपास के इलाकों में जाने से कतराते थे। इस इलाके में हल्बा, आदिवासी समाज के अलावा अन्य समाज के लोग भी रहते हैं।

दहशत के उस माहौल में न तो पंडितों से मुहूर्त निकलवाया जा सकता था और न ही पूरे विधि-विधान से कोई अनुष्ठान संपन्न हो सकता था। यही वजह रही कि लंबे वक्त तक इस क्षेत्र से भारी पलायन हुआ। लेकिन अब जब बस्तर धीरे-धीरे नक्सलमुक्त हो रहा है, तो लोग अपने गांव-घर की ओर लौटने लगे हैं।