आलेख : भारत का पद्मश्री इरफान खान: 21वीं सदी का कबीर, क्रांतिकारी और सर्वश्रेष्ठ कलाकार

फिजा में इंटरनेट ने इरफान खान का पैगाम भारत के राष्ट्रपति भवन से लेकर झोपड़ी तक पहुंचा दी। मानो सभी उसके रिश्तेदार हो जैसे। एक ऐसा शख्स जिसकी मौजूदगी से छल-कपट, प्रपंच की दुनिया भागने लगती हो जैसे। दुनिया में करोड़ों उनके चाहने वालों के लिए उनका जाना, उनके जिंदगी से जुड़ा हो जैसे। करोड़ों दर्शक इरफान को पसंद करने वाले उनके फिल्म देखने सिनेमाघरों में इसलिए जाते हैं कि इरफान की फिल्म है कोई मजाक नहीं है। सच्चाई, बगावत और इंसानियत का पक्षधर या ऐसा कुछ विषय जरूर होगा जो सोचने के लिए मजबूर कर देगा।
इरफान, इरफान, इरफान जैसे हवा में गूंज रही हो आवाज और मन को सुनाई देती हो गूंज जैसे, उसके ही चर्चे सभी जगह। गजब का प्रतिभा समेटे हुए इरफान। जन्म से मुस्लिम, लेकिन करोड़ों उनके चाहने वालों ने कभी उनको उनके धर्म से जानना जरूरी नहीं समझा। एक जुनून, प्यास इरफान की अदाकारी में, जिसे देखने के लिए आतुर रहती करोड़ों निगाहें। फिल्मों का चयन उनका व्यक्तिगत और व्यवहार से किया गया हो, लेकिन उनके अधिकतर फिल्म का उद्देश्य क्रांतिकारी, बागी, समाज-प्रशासन-धर्म में पनप रही कुरीतियों को नष्ट करना ही है। निजी जिंदगी में भी इरफान शाकाहारी बचपन से, वहीं अपने धर्म में दी जाने वाली बकरे के बलि के खिलाफ उनकी सार्वजनिक विचार, निश्चित ही वे पहले एक इंसान हैं फिर किसी मजहब के थे। उनके विचार, व्यवहार, शख्सियत इंसानियत की गवाही देती है। किसी ने उनसे पूछा कि दूसरे अभिनेता की तरह आप में खास शारीरिक पहचान नहीं है, तो उन्होंने कहा कि ऊपर वाले ने मुझे जो बोलने की शक्ति दी है, वही बाकी के मुकाबले बहुत है। कई सार्वजनिक स्थानों पर वे किसी अभिनेता के फूहड़ता को सार्वजनिक तौर पर विरोध करते हुए व्यंग्य करते हैं, तो धार्मिक लोगों के बीच किसी टीवी चर्चा कार्यक्रम में इंसानियत के प्रतिनिधि के तौर पर अपनी राय देते हैं।

बुद्धिजीवी चाहे वह भारतीय हो या विदेशी, हर कोई उनके बहुमुखी प्रतिभा और अभिनय की गहराई को सहज ही महसूस करते हैं। कबीर की तरह उनके अनुयायी हिन्दू भी हैं और मुस्लिम भी। इरफान किसी पहचान के लिए मोहताज नही है। उनकी पहचान उनके नाम और व्यक्तित्व ‘इरफान’ शब्द में समेटे हुए हैं।

फिल्मों में कभी पुलिस बनकर प्रशासन की खामियों को उजागर करते हैं तो कहीं मदारी फिल्म में एक आदमी का रोल करके वे देश में राजनेता और भ्रष्टाचार की गहराई का पर्दाफाश करते हैं। देखा जाए तो वो शख्स एक क्रांतिकारी ही है। फिल्म पान सिंह तोमर में देश के लिए फौजी बनकर मेडल हासिल करता है, वहीं डाकू बनकर समाज में फैले अत्याचार के विरूद्ध आवाज उठाता है। ये उनके सर्वश्रेष्ठ अभिनय की झलक है। फिल्म जितने भी उन्होंने अभिनीत किए हैं, सभी अभिनय के वो कई सारे तस्वीर हैं, जिसे इरफान ने अभिनय की स्याही से फिल्म के कैनवास में उकेरी है। आज आम आदमी, बुद्धिजीवी अपनी शख्सियत को देखना चाहे तो इरफान के जाने के बाद उसे और कोई अभिनेता से उम्मीद करना सहज नही है। कितना विश्वास, कैसे अटूट अदायगी, मानो वो खलनायकी भी करे तो अभिनेता के समांतार पहचान बनाएं।

इरफान 21वीं सदी का कबीर भी है, क्रांतिकारी भी और एक सर्वश्रेष्ठ कलाकार भी। उन्हें अभिनय कला के लिए भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया, जो सर्वमान्य पद्मश्री पुरस्कार के काबिल इरफान को मिला है। अभिनय के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का भी पुरस्कार इरफान को मिला। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी पहचान काबिल-ए-तारीफ है। फिल्म ने इरफान को पहचान दिलाई तो वहीं इरफान ने फिल्मों को पहचान दिलाई। एक डायलाॅग उन पर फिल्मांकन किया गया जिसमें एक शख्स इरफान के प्रेमिका के जाने के बाद पूछता है ‘क्या सर, जाने दिया आपने ? तब इरफान का जवाब ‘अबे मोहब्बत है इसीलिए तो जाने दिया’ और उनकी बोलती आंखे बहुत कुछ अदाकारी से समेटे हुए सर्वश्रेष्ठ कलाकार की पहचान देती है।-देवराम यादव

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