Real Hero: Life was at stake… He did not lose courage but… he kept battling for man and humanity… Finally he showed what you cannot think about…!| national News in Hindi

जयपुर। अंग दान के नाम पर देश में बड़ा छलावा हो रहा है। कई असामाजिक तत्वों का नेटवर्क दूसरों को ज़िंदगी देने के नाम पर युवाओं को ऑर्गन डोनेट करने के अनैतिक धंधे में धकेल रहा है। बड़ी संख्या में युवावर्ग अपने हालातों के मद्देनजर और पैसों की तंगी को देखते हुए इनके जाल में फंस जाते हैं और फिर दूसरों को खुशी देने के उद्देश्य से सोचे और किए गए कार्य में इन्हें न केवल विफलता मिलती है बल्कि ये युवा अपना सब कुछ दांव पर लगाने पर मजबूर हो जाते हैं।

ऑर्गन डोनेट के इसी मुद्दे पर आज हम आपको ऐसे ही एक युवा से मिलवाने जा रहे हैं जो ऐसे रैकेट का शिकार बना। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी…ज़िंदगी दांव पर लगी थी….लेकिन उसने आखिरकार तस्करों को पुलिस के हत्थे चढ़ा ही दिया…तो उस युवा की ही जुबानीं जानते हैं आखिर मामला था क्या…?

जयदीप शर्मा राजस्थान के सीकर जिले के एक युवा हैं। ऑर्गन डोनेट के इस रैकेट के बारे में बताते हुए वे कहते हैं कि पिछले साल पुणे से एमबीए करने के बाद वे जयपुर की एक कंपनी में इंटर्नशिप कर रहे थे। इसी दौरान उनका एक दोस्त राजेश, जो अत्यंत गरीब परिवार से था। इंटरनेट पर सर्फिंग करने के दौरान वो किडनी डोनेट करने के नाम पर मोटी रकद देने वाले गिरोह के झांसे में आ गया। शायद ये उसका दुर्भाग्य ही था कि उनसे संपर्क में आने के बाद वो पूरी तरह गुमशुदा हो गया था।

दोस्त की कोई ख़बर नहीं था। वो कहां था। मैं भी इस बात को लेकर परेशां था। लेकिन मैं उस समय सोच में पड़ गया जब मेरे पास भी 20 लाख रुपये के प्रस्ताव के साथ एक व्यक्ति का फोन आया। हालांकि उस दौरान मैंने थोड़ी समझदारी दिखाते हुए उस व़क्त उसे मना कर दिया। लेकिन तब उस गिरोह के सदस्य ने मुझे पैसे का लालच दिया और एक मेल आईडी आगामी संपर्क के लिए मुझे दे दी।

कुछ दिन और बीत चुके थे। लेकिन दोस्त की अभी भी कोई ख़बर नहीं थी। मैं अब और ज्यादा परेशान रहने लगा। अब मेरे दिमाग में उस किडनी बेचने-खरीदने वाले गिरोह को लेकर संदेह पैदा हुआ। क्योंकि मैं पहले भी कई बार समाचार चैनलों और अख़बारों में ऐसी खबरें पढ़ चुका था। लेकिन मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि मैं खुद भी इस गिरोह का शिकार बन जाउंगा। इसके बाद मैंने बहुत सोचा और अंत में इस मामले की तह तक जाने के लिए गिरोह के उस व्यक्ति को फोन किया जिसने मुझसे संपर्क साधने की कोशिश की थी।

मैंने योजना बनाई थी उन्हें पकड़वाने की और इसी के तहत मैंने इस बात की जानकारी एक टीवी चैनल के रिपोर्टर को दी। मैं खुद़ दिल्ली पहुंचा और उस पत्रकार की मदद से सारी दास्तां क्राइम ब्रांच के अधिकारियों को बताई। जिसके बाद उन्होंने मुझे निर्देश दिए कि इस गिरोह से जुड़े पूरे मामले पर नज़र रखो और हर छोटी से छोटी सूचना हम तक पहुंचाओ। साथ में रिकॉर्डिंग भी करता रहूं। मैं पेशेवर पत्रकार नहीं था, इसलिये मैं डर भी रहा था कि कहीं स्टिंग का भेद खुल जाए और वे लोग मेरे साथ कुछ गलत न कर दें।

डर को जैसे मैंने पूरी तरह खत्म कर दिया था और इसके बाद पुलिस के खुफिया कैमरे से हर रिकॉर्डिंग को पुलिस तक पहुंचाता गया। किडनी के दलालों ने मेरे फर्जी दस्तावेज तक तैयार कर लिये थे। हफ्तों तक चले दर्जनों टेस्ट और शरीर से तीन लीटर खून निकाले जाने के बाद मैं विचलित सा था। लेकिन मेरे दिमाग में ये बातें भी था कि यदि ये पकड़े नहीं गए तो ना कितनों का जीवन बर्बाद करेंगे।

आखिर में वो दिन भी आ ही गया जिस दिन आपरेशन कर मेरी किडनी निकाली जानी थी। लेकिन मेरी और पुलिस की योजना के तहत समय पर पुलिस ने पूरे गैंग का पर्दाफाश़ कर उन्हें गिरफ्त में ले लिया। इस दौरान मुझे खुशी तो थी कि मैंने एक नेक कार्य किया है। ऐसे कई लोगों की जिंदगी बचाई है लेकिन मैं इंसानियत को दम तोड़ते हुए देखकर दुखीः भी बहुत था। आखिर कैसे लोग ऐसे दूसरों के जीवन के साथ खेल सकते हैं। हालांकि इस दौरान मेरा अपने घर वालों से संपर्क तक टूट चुका था। क्योंकि कोई भी मां-बाप अपने 24 साल के बेटे को ऐसा खतरनाक स्टिंग करने के लिए कभी हां नहीं करते जिसमें उसकी जान दांव पर लगी हो।

स्टिंग महीने भर चला था। इस कारण मेरे कोई सूचना नहीं होने के कारण मेरे माता-पिता ने मेरी गुमशुदगी की रिपोर्ट तक लिखा दी थी। मैं तो फिर भी वापस अपने घर लौट चुका हूं। लेकिन मेरा दोस्त अभी भी लापता है। दिल्ली पुलिस उसे अभी भी तलाश कर रही है।

हालांकि ये मामला हमें एक बड़ी सीख दे गया है कि हमें अपने आसपास की गलत चीजों को अनदेखा करने की फितरत बदलनी होगी। तभी हम इंसान और इंसानियत को बचा पाएंगे और ऐसे गिरोह को सलाखों के पीछे….

 

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