खादी और ग्रामोद्योग पारंपरिक हुनर के लिए नई संभावनाएं पैदा कर रहे

 नई दिल्ली ।  किसी गांव में घूमता चरखा कभी राष्ट्रवाद का प्रतीक हुआ करता था। आज, वही भावना ग्रामीण उद्यमों के एक बढ़ते परिवेश के माध्यम से नया आकार ले रही है। शहद, हर्बल उत्पाद, केले के रेशे, वस्त्र और अन्य ग्रामोद्योग पारंपरिक हुनर के लिए नई संभावनाएं पैदा कर रहे हैं। आत्मनिर्भरता की यह भावना वोकल फॉर लोकल और आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण के साथ निरंतर प्रतिध्वनित हो रही है। वित्त, प्रौद्योगिकी और प्रशिक्षण तक पहुंच के जरिए पारंपरिक कौशल और स्थानीय संसाधनों को नए बाजार मिल रहे हैं।

स्थानीय उद्यमों और उपभोक्ताओं के बीच यह बढ़ता जुड़ाव खादी महोत्सव में भी झलकता है। खादी महोत्सव हर साल 2 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक आयोजित किया जाता है। विशेष रूप से युवाओं पर केंद्रित यह अभियान उन्हें खादी और “वोकल फॉर लोकल” के प्रति जागरूक करता है तथा आम जनता को खादी और स्थानीय उत्पाद खरीदने के लिए प्रोत्साहित करता है। इस बदलाव के केंद्र में खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) है। यह खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है। यह अधिनियम KVIC को ग्रामीण उद्योगों की योजना बनाने, उन्हें बढ़ावा देने, सुगम बनाने, संगठित करने और सहायता प्रदान करने का अधिकार देता है। इसमें प्रशिक्षण, कच्चा माल, विपणन, अनुसंधान और गुणवत्ता सुधार से जुड़े उपाय शामिल हैं। यह खादी और ग्रामोद्योग से जुड़ी तकनीकी जानकारी और सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ कौशल विकास और अनुसंधान को भी समर्थन देता है।

वर्ष 2025–26 में, खादी और ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री ऐतिहासिक 1.87 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई, जो अब तक का उच्चतम स्तर है (मई 2026 तक)। 2013–14 की तुलना में बिक्री में 501% की वृद्धि हुई, जबकि उत्पादन 380% बढ़कर 1,25,296 करोड़ रुपये हो गया। इस क्षेत्र में रोजगार 56% बढ़कर 2.04 करोड़ हो गया। कारीगरों को मिलने वाले पारिश्रमिक में भी बढ़ोतरी हुई है। यह 2013–14 में 4 रुपये प्रति लच्छी से बढ़कर वर्तमान में 15 रुपये प्रति लच्छी हो गया है, जो लगभग 275% की वृद्धि है।एक लच्छी लंबाई में 840 गज सूत और वजन में एक पाउंड के बराबर होता है।

ग्रामीण व्यवसायों का निर्माण, एक समय में एक कारीगर

हुनर सीखने से लेकर बाजार तक पहुंच बनाने तक, विभिन्न पहल के जरिए कारीगरों और ग्रामोद्योगों को सहयोग दिया जा रहा है। KVIC के पास 35 विभागीय और गैर-विभागीय प्रशिक्षण केंद्रों का एक नेटवर्क है। प्रशिक्षण में खाद्य उत्पाद, बेकरी, मधुमक्खी पालन, अगरबत्ती, मोमबत्ती, मोटर मरम्मत और कई अन्य गतिविधियां शामिल हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान, विभिन्न KVIC प्रशिक्षण कार्यक्रमों के तहत 79,682 प्रशिक्षुओं ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। खादी क्षेत्र के लगभग पांच लाख कारीगरों में 80% से अधिक महिलाएं हैं। वर्ष 2025–26 में, विभिन्न KVIC कार्यक्रमों के तहत 47,382 महिलाओं ने प्रशिक्षण लिया, जो कुल प्रशिक्षुओं का लगभग 59% है।

प्रशिक्षण के साथ-साथ टूलकिट और उपकरण वितरण, विपणन सहायता और अन्य उपाय भी किए जा रहे हैं। मार्च 2008 से, प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) ने KVIC के माध्यम से लगभग 97.95 लाख लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान किए हैं। ऐसे ही एक लाभार्थी श्री जितेंद्र बैठा हैं, जिन्होंने 2020 में बिहार में बेकरी उत्पाद निर्माण इकाई की स्थापना की। उनके इस उद्यम का वार्षिक टर्नओवर 72 लाख रुपये है और वर्तमान में यह स्थानीय समुदाय के 20 लोगों को रोजगार प्रदान करता है। सहायता में उद्यम वित्तपोषण और उत्पादन के लिए आवश्यक उपकरण और तकनीक भी शामिल हैं।

ग्रामोद्योग विकास योजना आधुनिक मशीनें, टूलकिट और उपकरण प्रदान करके कारीगरों को सशक्त बनाती है। 2025–26 के दौरान ऐसी 37,769 मशीनें, टूलकिट और उपकरण वितरित किए गए। इस योजना के तहत KVIC अब तक 3.23 लाख से अधिक मशीनें, टूलकिट और उपकरण वितरित कर चुका है (मई 2026 तक)। इन प्रयासों को उन उपायों से भी मजबूती मिलती है जो उस व्यापक तंत्र को सुदृढ़ करते हैं जिसमें खादी संस्थान और कारीगर काम करते हैं। खादी विकास योजना खादी संस्थानों को उत्पादों में सुधार करने, मूल्य संवर्धन करने और बदलती बाजार मांग के अनुरूप ढलने में मदद करती है। इसकी संशोधित बाजार विकास सहायता (MMDA) मूल्य संवर्धन और बाजार-उन्मुख मूल्य निर्धारण के लिए अधिक लचीलापन प्रदान करती है। 2024–25 के दौरान 1,097 खादी संस्थानों को 245 करोड़ रुपये वितरित किए गए, जिससे 1,45,484 कारीगरों को लाभ हुआ।

सस्ते ऋण की उपलब्धता सहायता का एक और स्तर जोड़ती है। ब्याज सब्सिडी पात्रता प्रमाणपत्र (ISEC) योजना के तहत पात्र खादी संस्थान 4% प्रति वर्ष की रियायती ब्याज दर पर ऋण प्राप्त कर सकते हैं। कारीगरों के लिए कार्यस्थल का माहौल भी मायने रखता है। वर्कशेड योजना बेहतर उत्पादन स्थल और अधिक अनुकूल कार्य वातावरण प्रदान करती है। वर्ष 2025–26 के दौरान, दिसंबर 2025 तक, इस योजना के तहत 1,309 कारीगर लाभान्वित हुए। ये उपाय कारीगरों को बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और उत्पादन के लिए आवश्यक संसाधनों तक पहुंच प्रदान करके सहयोग करते हैं।

ग्रामीण उद्यमों से व्यापक बाजारों तक

विभिन्न ग्रामोद्योगों में पारंपरिक कौशल और स्थानीय संसाधनों को तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार संपर्कों के सहयोग से नए व्यवसायों और उत्पादों में बदला जा रहा है। अनुसंधान और विकास के प्रयास उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत कर रहे हैं। श्री एस.पी. सिंह ने KVIC के जरिए PMEGP योजना के तहत मिले सहयोग से शहद और कुकीज का उद्यम स्थापित किया। पंजाब स्थित उनका व्यवसाय अब लगभग 200 श्रमिकों को रोजगार देता है और अपने उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात करता है। शहद और कुकीज उनके प्रमुख उत्पादों में शामिल हैं, जिनमें निर्यात का एक बड़ा हिस्सा संयुक्त राज्य अमेरिका को जाता है।

2010 में सहायता प्राप्त करने के बाद, इस उद्यम ने अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेकर धीरे-धीरे अपनी निर्यात उपस्थिति का विस्तार किया। KVIC ने दुबई, संयुक्त राज्य अमेरिका और मध्य पूर्व की प्रदर्शनियों में भागीदारी को सुगम बनाया, जिससे उद्यम को विदेशी खरीदारों से जुड़ने में मदद मिली। आज यह व्यवसाय 36 देशों में निर्यात करता है और यूरोपीय बाजारों में शहद निर्यात बढ़ाने के लिए राजपुरा, पंजाब में एक दूसरी इकाई विकसित कर रहा है।

श्री बी. सुंदरराज के लिए एक प्राकृतिक सुगंधित पौधा ग्रामीण उद्यम का आधार बन गया। अपनी अगरबत्ती इकाई के माध्यम से वह अगरबत्ती, हर्बल उत्पाद, वेटिवर (खस) अगरबत्ती और वेटिवर सांब्रानी का उत्पादन करते हैं। वर्ष 2024-25 के दौरान ग्रामोद्योग विकास योजना (GVY) के तहत सहायता से उन्होंने अपनी विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत किया और अपने उत्पाद श्रृंखला में विविधता लाई। इससे वे स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधन से कई मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने में सक्षम हुए। उनका उद्यम दर्शाता है कि KVIC का सहयोग किस प्रकार पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय संसाधनों को विपणन योग्य ग्रामोद्योग उत्पादों में बदलने में मदद कर सकता है।

हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले के जट्टीमाजरा गांव में  साहिल चौधरी मोनो-कार्टन निर्माण इकाई चलाते हैं। यह उद्यम क्षेत्र में निर्माण और पैकेजिंग की आवश्यकताओं को पूरा करता है। 25 लाख रुपये की परियोजना लागत से स्थापित यह इकाई KVIC समर्थित PMEGP के तहत संचालित होती है। यह उद्यम अब लगभग 45 लाख रुपये का वार्षिक टर्नओवर दर्ज करता है और 23 लोगों को रोजगार प्रदान करता है। वित्तीय सहायता ने चौधरी के उद्यमशील विचार को एक कार्यशील विनिर्माण उद्यम में बदलने में मदद की। उनकी यह यात्रा दर्शाती है कि स्थानीय उद्यमिता किस प्रकार आत्मनिर्भरता, रोजगार और आत्मनिर्भर भारत के व्यापक दृष्टिकोण में योगदान दे सकती है।

ग्रामीण उद्यमों के लिए नए बाजार खोलना

KVIC ने उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए डिजिटल और भौतिक दोनों माध्यमों का विस्तार किया है। इसका एक ऑनलाइन खादी इंडिया स्टोर (www.khadiindia.gov.in) है जो कपड़े, वस्त्र, किराना, सौंदर्य उत्पाद, आवश्यक तेल (essential oils), इत्र और अगरबत्ती सहित कई प्रकार के उत्पाद पेश करता है। खादी इंडिया ब्रांड को समर्पित प्रचार और विपणन पहल के माध्यम से समर्थन दिया जाता है। ये प्रयास पारंपरिक उत्पादों को आधुनिक उपभोक्ताओं से जोड़ते हैं। इसका विपणन नेटवर्क पूरे देश में फैला हुआ है। इसमें 8 विभागीय खादी इंडिया बिक्री केंद्र और 15 KVIC शाखाएं शामिल हैं। खादी संस्थान देशभर में 8,035 अन्य बिक्री केंद्रों का संचालन करते हैं। राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, राज्य और जिला स्तर की प्रदर्शनियां अतिरिक्त बाजार अवसर प्रदान करती हैं। KVIC घरेलू और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में भागीदारी को भी बढ़ावा देता है।