बिलासपुर. छत्तीसगढ़ में वर्ष 2017 से अपने महंगाई भत्ते (डीए) का इंतजार कर रहे लाखों सरकारी कर्मचारियों के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है। बिलासपुर उच्च न्यायालय ने राज्य के अधिकारियों और कर्मचारियों के लंबित महंगाई भत्ते के भुगतान से जुड़ी एक अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए शासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह चार सप्ताह के भीतर इस विषय पर अपना आधिकारिक पक्ष प्रस्तुत करे। यह कदम प्रदेश के उन तीन लाख से अधिक शासकीय कर्मचारियों के लिए एक नई कानूनी उम्मीद लेकर आया है, जो बीते कई वर्षों से अपने वित्तीय अधिकारों की बहाली की मांग कर रहे हैं।
कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन द्वारा पिछले सप्ताह गुरुवार को हाईकोर्ट के समक्ष यह याचिका दायर की गई थी, जिस पर सोमवार को गंभीरता से प्रारंभिक सुनवाई हुई। फेडरेशन का स्पष्ट तर्क है कि वर्तमान महंगाई के दौर में कर्मचारियों को उनके भत्ते से इतने लंबे समय तक वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है और शासन को इसके लिए जवाबदेह होना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े 5 महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं:
- बिलासपुर हाईकोर्ट ने लंबित डीए मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब तलब किया है।
- छत्तीसगढ़ के 3 लाख से अधिक शासकीय अधिकारियों और कर्मचारियों का महंगाई भत्ता वर्ष 2017 से बकाया है।
- कर्मचारियों के हकों की लड़ाई के लिए यह याचिका ‘छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन’ की ओर से दायर की गई है।
- फेडरेशन ने सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया आदेश का मुख्य हवाला दिया है, जिसमें डीए और डीआर को कर्मचारियों का वैधानिक अधिकार माना गया है।
- ज्ञापन सौंपने और सुनवाई न होने के बाद, कर्मचारी संगठन ने 6 फरवरी की बैठक में न्यायालय जाने का अंतिम फैसला लिया था।
हाल ही में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम निर्णय में यह स्पष्ट किया था कि महंगाई भत्ता (डीए) और महंगाई राहत (डीआर) कर्मचारियों तथा पेंशनरों का एक वैधानिक अधिकार है, जिसे रोका नहीं जा सकता। इसी निर्णय को मुख्य आधार बनाते हुए छत्तीसगढ़ के कर्मचारी संगठनों ने राज्य में भी अपने रुके हुए भत्तों और एरियर के भुगतान के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। न्यायालय में लगाई गई यह याचिका इसी कानूनी परिप्रेक्ष्य पर निर्भर है ताकि राज्य सरकार को भुगतान के लिए निर्देशित किया जा सके।
छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन के प्रांतीय संयोजक कमल ने इस कानूनी कदम पर विस्तार से बताया कि बीते 6 फरवरी को संगठन की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई थी। इसी बैठक में सर्वसम्मति से तय हुआ कि केवल शासन स्तर पर बात करने से हल नहीं निकलेगा। उनका कहना है कि वर्ष 2017 से रुके हुए डीए और एरियर के भुगतान के लिए सरकार को कई बार ज्ञापन सौंपे गए, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक सुनवाई नहीं हुई।
संगठन का दावा है कि वह कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए तीनों स्तरों— शासन से संवाद, सड़क पर प्रदर्शन और अब न्यायालयीन प्रक्रिया के मोर्चे पर एक साथ संघर्षरत है। अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के उस जवाब पर टिकी हैं, जो उसे तय समय सीमा के भीतर हाईकोर्ट की बेंच के समक्ष रखना है।
