पूर्व अमेरिकी अधिकारी ब्रेट मैकगर्क की चेतावनी- ईरान से टकराव ट्रंप के कार्यकाल के बाद भी जारी रहने की आशंका

नई दिल्ली। व्हाइट हाउस में मिडिल ईस्ट मामलों के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ब्रेट मैकगर्क ने चेतावनी दी है कि ईरान के साथ जारी सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध केवल मौजूदा ट्रंप प्रशासन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अगली अमेरिकी सरकार के लिए भी एक बड़ी चुनौती बना रह सकता है। वहीं दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन का दावा है कि वह ईरान पर कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर कड़ा दबाव बनाए हुए है।

  • लंबे संघर्ष की आशंका: पूर्व बाइडेन सलाहकार ब्रेट मैकगर्क के अनुसार, फिलहाल ईरान के साथ किसी स्थायी शांति समझौते के आसार नहीं हैं।
  • परमाणु कार्यक्रम पर अड़चन: तेहरान परमाणु हथियारों की क्षमता को अपनी सबसे बड़ी सुरक्षा गारंटी मान रहा है, जिससे किसी समझौते पर पहुंचना बेहद जटिल हो गया है।
  • ट्रंप प्रशासन का रुख: अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि सरकार अगली सत्ता के लिए परमाणु संपन्न ईरान छोड़कर नहीं जाएगी; सैन्य और कूटनीतिक दोनों विकल्प खुले हैं।
  • घरेलू राजनीति पर असर: अमेरिकी मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले 66% मतदाताओं ने युद्ध से निपटने के ट्रंप के तौर-तरीकों पर असंतोष जताया है; ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव बड़ा चुनावी मुद्दा बना।

“जिमी कार्टर से लेकर अब तक हर राष्ट्रपति के सामने रही ईरान की चुनौती”

राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका के कोऑर्डिनेटर रहे ब्रेट मैकगर्क ने सीएनएन के फरीद जकारिया से बातचीत में कहा कि ईरान की समस्या दशकों पुरानी है। मैकगर्क ने कहा, “अगर मुझे अनुमान लगाना हो, तो यह टकराव ट्रंप के पूरे कार्यकाल तक खिंचेगा और फिर अगले राष्ट्रपति को भी इससे जूझना पड़ेगा। जिमी कार्टर के समय से ही हर अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस संकट का सामना किया है।” उन्होंने रेखांकित किया कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद पूरे पश्चिम एशिया में शक्ति का संतुलन बुनियादी तौर पर बदल चुका है। ईरान के परमाणु ठिकानों पर ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ और उसके बाद 28 फरवरी से शुरू हुए सैन्य टकराव ने स्थिति को और पेचीदा बना दिया है। उनके अनुसार, चूंकि हालिया अभियान में शासन परिवर्तन (रेजीम चेंज) का विकल्प खुला रखा गया था, इसलिए अब इस टकराव से सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता तय करना बेहद मुश्किल हो गया है।

परमाणु समझौते पर संशय और सीमित संघर्ष का दौर

  • मैकगर्क का मानना है कि आने वाले समय में:
  • ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध जारी रहेंगे।
  • दोनों पक्षों के बीच समय-समय पर सीमित सैन्य कार्रवाइयां और छिटपुट सीजफायर देखने को मिल सकते हैं।
  • परमाणु समझौते की उम्मीद बेहद कम है, क्योंकि ईरानी नेतृत्व परमाणु हथियार विकसित करने की अपनी क्षमता को ही सत्ता की सर्वोच्च सुरक्षा गारंटी मान रहा है।

सैन्य और कूटनीतिक दबाव दोनों जारी: ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट

मैकगर्क की इस चेतावनी के बीच अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने सीबीएस न्यूज के कार्यक्रम ‘फेस द नेशन’ में प्रशासन का पक्ष रखा। फारस की खाड़ी में तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और अतिरिक्त एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती पर उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप का रुख एकदम साफ है—ईरान को किसी भी हाल में परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा।

राइट ने कहा:

“हम इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हर रास्ते पर विचार कर रहे हैं—चाहे वह आर्थिक दबाव हो या सैन्य कार्रवाई। हम अगली सरकार के लिए परमाणु हथियारों से लैस ईरान नहीं छोड़ सकते।” ऊर्जा संकट पर बात करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि खाड़ी क्षेत्र से तेल आपूर्ति पर खतरे की आशंका हमेशा बनी रहती है, हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिकी उत्पादन में वृद्धि और गर्मियों के बाद मांग में कमी से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप को फैसले लेते समय पता था कि अल्पकाल में ऊर्जा की कीमतें बढ़ सकती हैं और इसका राजनीतिक नुकसान हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में यह कदम उठाया गया।

मिडटर्म चुनावों पर युद्ध और ईंधन कीमतों की मार

अमेरिका में मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों में अब महज एक महीने का समय बचा है और ईरान संघर्ष का घरेलू राजनीति पर सीधा असर दिखने लगा है:

  • मतदाताओं की राय: हालिया मीडिया सर्वेक्षणों के अनुसार, 90% वोटरों का मानना है कि ईरान संकट के चलते अमेरिका में गैस और ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं।
  • क्विनीपियाक पोल: लगभग 66% पंजीकृत मतदाताओं ने युद्ध से निपटने के ट्रंप प्रशासन के तरीके को नापसंद किया है, जबकि केवल 28% ने इसका समर्थन किया है।
  • चुनावी असर: रिपब्लिकन रणनीतिकारों और पूर्व गवर्नर क्रिस क्रिस्टी के अनुसार, बढ़ती महंगाई और खाड़ी में लंबे खिंचते सैन्य तनाव का सीधा नुकसान चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों को उठाना पड़ सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां सैन्य परिवारों की आबादी अधिक है।