छत्तीसगढ़ में हाल ही में लागू हुए ‘धर्म स्वतंत्रता कानून 2026’ (धर्मांतरण कानून) को लेकर सूबे की सियासत और सामाजिक गलियारों में जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। राज्यपाल की अंतिम मंजूरी मिलने के बाद यह कानून पूरे प्रदेश में लागू हो चुका है। लेकिन अब यह पूरा विवाद सड़क से उठकर अदालत की चौखट तक पहुंच गया है, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ आमने-सामने खड़े हैं।
मसीही समाज ने हाईकोर्ट में दी चुनौती
दरअसल, मसीही समाज इस नए कानून का लगातार विरोध कर रहा है।
- इसी कड़ी में, मसीही समाज के प्रतिनिधि क्रिस्टोफर पॉल ने सीधे छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
- क्रिस्टोफर पॉल ने हाईकोर्ट में एक अहम याचिका दाखिल की है, जिसमें इस नए कानून के कई कड़े प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
- याचिका में यह तर्क दिया गया है कि यह कानून भारत के संविधान द्वारा प्रत्येक नागरिक को दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का सीधा-सीधा उल्लंघन करता है। ईसाई समुदाय का मानना है कि आस्था चुनना एक निजी अधिकार है, जिसे इस कानून के जरिए सीमित किया जा रहा है।
मंत्री गजेंद्र यादव का तीखा पलटवार: ‘गलत काम करने वालों की घबराहट’
वहीं, मसीही समाज द्वारा हाईकोर्ट में याचिका लगाए जाने के बाद राज्य सरकार के मंत्रियों ने भी मोर्चा खोल दिया है।
- स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने इस पूरे मामले पर बेहद तीखी और करारी प्रतिक्रिया दी है।
- मंत्री गजेंद्र यादव ने साफ शब्दों में कहा कि जो लोग इस कानून के खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं या अदालत का दरवाजा खटखटा रहे हैं, वे दरअसल खुद अपने कृत्यों पर संदेह जता रहे हैं।
- उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह सब गलत काम करने वालों की घबराहट है। उनके मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति या संस्था गलत काम (अवैध धर्मांतरण) नहीं कर रही है, तो उन्हें इस कानून से डरने या इस तरह की घबराहट दिखाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं पड़नी चाहिए।
क्या है सरकार और ईसाई समुदाय का अपना-अपना तर्क?
हालांकि, सरकार और ईसाई समुदाय दोनों के अपने-अपने मजबूत तर्क हैं। सरकार का साफ कहना है कि यह नया कानून किसी को अपनी मर्जी से धर्म मानने से नहीं रोकता है। बल्कि, यह कानून उन लोगों और संस्थाओं पर रोक लगाने के लिए बनाया गया है, जो जबरन, पैसों का लालच देकर, या धोखे और चमत्कार का जाल बिछाकर भोले-भाले लोगों का धर्मांतरण कराते हैं। नए प्रावधानों के तहत ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर कड़ी सजा और भारी जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
अब इस पूरे संवेदनशील और बहुचर्चित विवाद पर अंतिम फैसला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई के बाद ही साफ हो पाएगा। पूरे प्रदेश की निगाहें अब हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हुई हैं।
