Ramkumar Toppo:छत्तीसगढ़ की राजनीति और कानूनी गलियारों से एक बहुत अहम खबर सामने आई है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने विधानसभा चुनाव 2023 से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अपना फैसला सुना दिया है। अदालत ने सरगुजा जिले की हाई-प्रोफाइल सीतापुर विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक रामकुमार टोप्पो को एक बड़ी राहत दी है। हाई कोर्ट ने उनके निर्वाचन को चुनौती देने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रत्याशी मुन्ना लाल टोप्पो की चुनाव याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया है।
नामांकन निरस्त करने को दी गई थी चुनौती
दरअसल, यह पूरा मामला विधानसभा चुनाव के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा लिए गए एक फैसले से जुड़ा हुआ था।
- आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी मुन्ना लाल टोप्पो ने हाई कोर्ट में निर्वाचन याचिका क्रमांक 01/2024 दायर की थी।
- अपनी याचिका में उन्होंने अपने नामांकन पत्र को रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा निरस्त (रद्द) किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।
- मुन्ना लाल टोप्पो का आरोप था कि चुनाव अधिकारी ने गलत आधार और गलत तरीके से उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया था, जिसके कारण वे चुनाव लड़ने से वंचित रह गए थे।
- इस पूरे प्रकरण की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जस्टिस संजय के. अग्रवाल की एकल पीठ के समक्ष हुई।
कोर्ट में क्या दी गई दलीलें?
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों ने अपनी-अपनी जोरदार दलीलें पेश कीं।
- याचिकाकर्ता मुन्ना लाल टोप्पो की ओर से अधिवक्ता डॉ. जितेंद्र किशोर मेहता और आनंद कुमार कुजूर ने अदालत में अपना पक्ष रखा।
- वहीं, राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अधिवक्ता राकेश कुमार झा उपस्थित हुए, जबकि विधायक रामकुमार टोप्पो की ओर से अधिवक्ता शरद मिश्रा ने बचाव में पैरवी की।
- विधायक रामकुमार टोप्पो के वकील और प्रतिवादी पक्ष ने अदालत में एक बेहद अहम तर्क पेश किया। उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता ने स्वयं अपने नामांकन पत्र और शपथपत्र (एफिडेविट) में इस बात को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया था कि उनका सरकार के साथ एक अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) चल रहा है।
- यह अनुबंध जल जीवन मिशन के तहत था। प्रतिवादी पक्ष ने दलील दी कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 9A के अंतर्गत, सरकार के साथ लाभ का अनुबंध होना चुनाव लड़ने के लिए एक स्पष्ट अयोग्यता (Disqualification) का आधार बनता है।
अदालत का फैसला और अयोग्यता का कारण
हाई कोर्ट ने सभी दस्तावेजों, साक्ष्यों और दोनों पक्षों की लंबी दलीलों की गहनता से जांच की।
अंततः, सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने मुन्ना लाल टोप्पो की याचिका खारिज कर दी और साथ ही यह निर्देश भी दिया कि इस कानूनी प्रक्रिया का अपना-अपना खर्च दोनों पक्ष स्वयं वहन करेंगे।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल की पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता मुन्ना लाल टोप्पो ने खुद अपने सरकारी अनुबंध की जानकारी अपने शपथपत्र में दी थी। ऐसे में वह बाद में अपने ही दिए गए बयान और दस्तावेजों से पीछे नहीं हट सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट रूप से माना कि रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा उपलब्ध रिकॉर्ड और तथ्यों के आधार पर जो नामांकन निरस्त करने की प्रक्रिया अपनाई गई थी, वह पूरी तरह से वैध और कानून के दायरे में थी।
याचिकाकर्ता अदालत में यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि उसका नामांकन गलत तरीके से या दुर्भावना से खारिज किया गया था।
