मियावाकी तकनीक: छत्तीसगढ़ में बंजर भूमि और खदानों पर लहलहा रहे ‘जापानी जंगल’

Chhattisgarh Forest

Chhattisgarh Forest:छत्तीसगढ़ में पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के लिए एक जापानी फॉर्मूला ‘मियावाकी तकनीक’ (Miyawaki Technique) गेमचेंजर साबित हो रहा है। राज्य वन विकास निगम लिमिटेड द्वारा अपनाई गई इस विधि से न केवल बंजर भूमि, बल्कि कोयला खदानों के डंप क्षेत्रों को भी महज़ कुछ सालों में घने और आत्मनिर्भर जंगलों में बदला जा रहा है।

क्या है मियावाकी तकनीक और इसके फायदे?

जापानी वनस्पतिशास्त्री डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित यह तकनीक शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए आदर्श मानी जाती है।

  • रफ्तार और घनत्व: पारंपरिक वृक्षारोपण की तुलना में इस विधि से पौधे 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं और 30 गुना अधिक घने जंगल तैयार होते हैं।
  • आत्मनिर्भरता: मियावाकी पद्धति में स्थानीय प्रजातियों के पौधों को अधिक घनत्व में लगाया जाता है। इन वनों की शुरुआती 2-3 वर्षों तक ही देखभाल करनी पड़ती है, जिसके बाद ये पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाते हैं और इन्हें खाद-पानी की जरूरत नहीं पड़ती।
  • पर्यावरणीय लाभ: ये जंगल पारंपरिक वनों की तुलना में 30 गुना अधिक कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को कम करने में बड़ी मदद मिलती है।

राज्य में कहां-कहां तैयार हुए मियावाकी वन?

छत्तीसगढ़ में वर्ष 2022 से इस तकनीक का तेजी से उपयोग किया जा रहा है:

  • 2022: कोटा मण्डल में NTPC के सहयोग से 1.3 हेक्टेयर में 30 हजार पौधे लगाए गए।
  • 2023: कोटा के भिल्मी में 6.4 हेक्टेयर में 64 हजार और गेवरा में 2 हेक्टेयर भूमि पर 20 हजार पौधे रोपे गए।
  • 2024: कोटा के उच्चभट्टी में 3.2 हेक्टेयर में 32 हजार पौधे और रायगढ़ मण्डल में 3.75 हेक्टेयर पर 37,500 पौधे लगाए गए।
  • 2025 की परियोजनाएं: बारनवापारा में 6 हजार, कोरबा-रायगढ़ में 40 हजार (SECL के सहयोग से), और महानदी कोलफील्ड द्वारा 64 हजार पौधों का रोपण कार्य जारी है। अरपा नदी के किनारे भी बड़े पैमाने पर हरित क्षेत्र का विस्तार हो रहा है।

गेवरा का ‘बंजर से जंगल’ तक का सफर

सबसे बड़ी चुनौती कोयला खनन के बाद बचे डंप क्षेत्रों को हरा-भरा करने की थी। यहां उपजाऊ मिट्टी नीचे दब जाती है और ऊपर केवल पत्थर और कोयले के अवशेष बचते हैं। लेकिन वन विभाग ने कोरबा जिले के गेवरा क्षेत्र के 12.45 हेक्टेयर डंप क्षेत्र में अनूठी पहल करते हुए 33,935 मिश्रित प्रजातियों (नीम, शीशम, बांस, महुआ आदि) का सफल रोपण किया है।

वैज्ञानिक तरीके से मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए वर्मी कम्पोस्ट, नीमखली और डीएपी का उपयोग किया गया। वन मंत्री केदार कश्यप ने इस प्रयास की सराहना करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण के लिए एक मजबूत कदम बताया है। पांच वर्षों (2025-2029) तक रखरखाव के बाद यह पूरा हरित क्षेत्र SECL गेवरा को सौंप दिया जाएगा।