US Iran War:वाशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान (US-Iran) के बीच छिड़ा भू-राजनीतिक संघर्ष अब एक बेहद जटिल कूटनीतिक पेच में फंस गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के लिए एक ऐसा ‘विष का प्याला’ या कड़वा घूंट बनता जा रहा है, जिसे उन्हें न चाहते हुए भी पीना पड़ेगा। दोनों देशों के भीतर बैठे कट्टरपंथी तत्व इस बातचीत में सख्त रवैया अपनाने की वकालत कर रहे हैं, जिससे समाधान का रास्ता और भी मुश्किल हो गया है।
ट्रंप की चाहत और ‘होर्मुज जलमार्ग’ का पेंच
इस कूटनीतिक गतिरोध के पीछे दोनों देशों की अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं:
- ट्रंप की जिद: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि वह ईरान के साथ एक ऐसा समझौता करें, जिसे वह पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए समझौते से कहीं बेहतर बताकर अपनी जनता के सामने पेश कर सकें।
- ईरान की मांग: दूसरी ओर, ईरान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘होर्मुज जलमार्ग’ (Strait of Hormuz) पर अपना नियंत्रण चाहता है। वह यहां से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों पर टोल टैक्स लगाना चाहता है। हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का स्पष्ट मानना है कि विश्व बिरादरी ऐसी किसी भी शर्त को कभी स्वीकार नहीं करेगी।
मध्यावधि चुनावों और ऊर्जा संकट का दबाव
इतिहास गवाह है कि जब भी देश युद्ध में उलझते हैं, तो समय और परिस्थितियों का दबाव उन पर हावी होने लगता है। ट्रंप प्रशासन इस वक्त भारी घरेलू दबाव का सामना कर रहा है:
- महंगाई और राजनीतिक संकट: युद्ध के कारण ऊर्जा (कच्चे तेल) की कीमतों में भारी उछाल आ रहा है। अगर होर्मुज जलमार्ग नहीं खुला और ऊर्जा की स्थिति यूं ही बिगड़ती रही, तो अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी को आगामी मध्यावधि चुनावों में बेहद मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
- समझौते का दबाव: इसी राजनीतिक संकट के डर से ट्रंप प्रशासन पर ईरान के साथ किसी सहमति पत्र (MoU) पर हस्ताक्षर करने का भारी दबाव है।
ईरान की मजबूरी और पलायन का डर
दूसरी तरफ, ईरान भी अपनी आर्थिक मजबूरियों से जूझ रहा है:
- अर्थव्यवस्था की जरूरत: ईरान पर अपने ऊर्जा निर्यात को फिर से शुरू करने का भारी दबाव है, क्योंकि यही उसकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया है। युद्ध के बाद देश के पुनर्निर्माण के लिए भी उसे पैसों की सख्त जरूरत है।
- शरणार्थी संकट का खौफ: एक बड़ा कारण यह भी है कि यदि युद्ध में ईरान पूरी तरह नष्ट हुआ और वहां के नागरिकों का जीवन बदहाल हो गया, तो वहां से बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो जाएगा। यह पलायन निश्चित रूप से पश्चिमी देशों की ओर होगा, जिसका असर विश्व की राजनीतिक व आर्थिक स्थिति पर ऐसा पड़ेगा, जिसके बारे में फिलहाल अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
यही कारण है कि कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि ट्रंप को अपने राजनीतिक और वैश्विक हितों को बचाने के लिए इस युद्ध में ‘कड़वा घूंट’ पीना ही पड़ेगा।
